पंख
मेरे उड़ने से वह दुखी हैं तो उन्हें खुशियां बांट देता हूं।
और उनकी खुशी के खातिर अपने पंख काट लेता हूं
खुद ही थामें बैठा हूं औजार अपनी बर्बादी का ।
काट लू पंख या खींच दू डोर अपनी आजादी का।।
दिया जो खंजर हमने उस वसीदें को,
तो उसने हमसे नाता तोड़ लिया।
साथ ही साथ---
उसने पंख काट कर परिंदा को छोड़ दिया ।
जान भी ले ली और जिंदा छोड़ दिया ।।
अरे जाना ही था, वह तो एक बहाने की तलाश में रुकी थी ।
काट लिए पंख मैंने खुद के , उसे रोकने के लिए
जो मेरे उड़ने से दुखी थी ।।
फिर मैंने उससे कहा
सुख में ना सही दुख में जुड़ जाएंगे।
तुम जहां कहोगे वहां मुड़ जाएंगे।।
वादा करो तुम साथ निभाना का ।
हम पंख के बिना भी उड़ जाएंगे ।।
फिर मैंने उसे अपने घर की कहानी बताई ---
अच्छे बेटे और भाई का किरदार निभाना जरूरी है ।सपने बाद में पहले परिवार मजबूरी है।।
सबके हिस्सों में आने के लिए मैंने अपने आप को कई भागों में बांट लिया है।
आसमान में उड़ने के सपने देखने वाले उस लड़के ने अपने हाथों से अपने पंख को काट लिया है ।।
फिर कुछ लोग मेरे बारे में कुछ बातें करते है
और कहते हैं
पंख जो कभी आसमान को छूते थे,
आज उन्हीं को खुद ही काट रहे हैं।
सपनों की उड़ान थम सी गई है ,
जिंदगी के गम दिल पर छा रहे हैं,
खुद से लड़ रहा है वह यह कैसी जंग है,
उड़ने की चाह है और उम्मीद तंग है,
कभी तो यह पर वापस कब आएंगे
आसमान से कह दो हम फिर दोबारा मुस्कुराएंगे।।
बाद में लड़का अपनी मां के लिए कहता है
मेरी उड़ान तुझसे ही थी तेरे बिना उड़ के मैं क्या करूंगा।
और तू ही ना रही तू इन पंखों का क्या करूंगा ।।
अंशुमान सिंह 'अंशु '
Fed9⁹
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