Golden dear
हम सोने के हिरन नहीं हैं
हम पर तीर न ताना जाये
क्यों वन में हम भटक रहे हैं
यह सच भी तो जाना जाये !
हमें समझना हो तो कोई
कृष्ण बाँसुरी अपनी छेड़े
हमें समझना हो तो कोई
उद्धव फिर बरसाना जाये !
हम नदियों के तट पर रहते
हमें नीर की प्यास नहीं है
घायल चरन, न इसका कारण
मरीचिका को माना जाये !
बाहर भटक रहें हैं पर
भीतर कस्तूरी खोज रहे हैं
शायद इससे हरे भरे इस
जंगल का वीराना जाये !
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